Shyari--
यादों पर
जो आँखों से दूर हो जाते हैं,
वो दिल के और क़रीब हो जाते हैं।
कुछ रिश्ते अजीब होते हैं,
दूर रहकर भी दिल में नसीब हो जाते हैं।
त्योहारों पर
दीये जलाने से हर अँधेरा मिटता नहीं,
मिठाई बाँटने से हर रिश्ता मीठा होता नहीं।
त्योहार तभी मुकम्मल होते हैं,
जब कोई अपना हमसे रूठा होता नहीं।
वक्त पर
वक्त ने बदले चेहरे, वक्त ने बदले हालात,
मगर दिल में ज़िंदा रहीं कुछ पुरानी-सी बात।
लोग आगे बढ़ गए, ज़िंदगी चलती रही,
यादों के एक कोने में बचपन पलता रहा।
अब्बू पर
उँगली छोटी थी मेरी, सहारा बड़ा था,
अब्बू का साथ ही मेरा जहाँ सारा था।
आज मंज़िलें हैं, मगर वो सुकून नहीं,
उनके साथ जैसा कोई और जुनून नहीं।
माँ-बाप पर
जिन्होंने अपनी ख़ुशियाँ हमारी ख़ातिर खो दीं,
हमने कभी-कभी उनकी कुर्बानियाँ ही भुला दीं।
ज़रा ठहरकर देखना उनके थके हुए चेहरे,
वहीं मिलेंगे तुम्हें मोहब्बत के सबसे गहरे पहरे।
दिल ढूँढ़ता है फिर वही फ़ुर्सत के रात-दिन,
फिर किसी की याद, किसी का इंतज़ार,
किसी अधूरे ख़्वाब का मीठा-सा ख़ुमार।
कभी ख़ामोशी में भी दिल की आवाज़ आती है,
कभी तन्हा रात यादों का संसार बन जाती है।
तो आइए, आज रात की इस ख़ामोशी में
खोलें अपनेपन के कुछ रंग,
और यादों के साथ जी लें
ज़िंदगी के कुछ खूबसूरत पल।
घर तो रोशनी से जगमगाते हैं,
मगर दिलों में अँधेरे क्यों हैं?
मिठाइयाँ तो खूब बँटती हैं,
मगर रिश्तों में कड़वाहट के घेरे क्यों हैं?
कभी त्योहार अपनों से मिलने का बहाना हुआ करते थे,
रूठे हुए मनाए जाते थे,
गिले-शिकवे मिटाए जाते थे।
आज मोबाइल पर पैग़ाम तो आते हैं,
मगर अपने दरवाज़े तक कम ही आते हैं।
दीये तो हर आँगन में जलते हैं,
मगर कुछ दिल आज भी तन्हा रहते हैं।
क्या फ़ायदा उन रोशनियों का,
अगर किसी अपने का दिल उदास हो?
क्या मतलब उन मिठाइयों का,
अगर रिश्तों में मिठास ही न हो?
कहीं माँ बेटे की राह तकती है,
कहीं बहन भाई की आवाज़ को तरसती है,
कहीं एक पुराना दोस्त इंतज़ार में है,
जिसकी दोस्ती एक ग़लतफ़हमी की दीवार में है।
ज़िंदगी छोटी है, रिश्ते अनमोल हैं,
कुछ कहे हुए लफ़्ज़, कुछ अनकहे बोल हैं।
क्या पता कल मनाने का मौक़ा मिले न मिले,
क्या पता फिर अपनों से मिलने का दिन खिले न खिले।
तो इस त्योहार पर एक पहल कीजिए,
किसी रूठे हुए को फिर अपना लीजिए।
माँ-बाप के पास बैठकर दो बातें कर लीजिए,
किसी तन्हा इंसान का हाल पूछ लीजिए।
त्योहारों की असली रौनक बाज़ारों में नहीं,
अपनों के चेहरों की मुस्कान में है।
खुशियों का असली मतलब तोहफ़ों में नहीं,
रिश्तों की मिठास और प्यार में है।
नफ़रतों के दौर में मोहब्बत का पैग़ाम बनिए,
टूटते रिश्तों के लिए उम्मीद की पहचान बनिए।
त्योहार तो हर साल आते रहेंगे,
आप किसी के चेहरे की मुस्कान बनिए।
आइए, ऐसी दुनिया बनाएँ,
जहाँ सिर्फ़ घर नहीं, दिल भी रोशन हों,
सिर्फ़ मुबारकबाद के पैग़ाम नहीं,
एक दिल से दूसरे दिल तक मोहब्बत के पैग़ाम हों।
कभी गुज़रा हुआ लम्हा मुस्कान बनकर लौट आता है,
कभी किसी अपने की कमी आँखों को नम कर जाती है।
कभी कोई अनकहा अल्फ़ाज़ होंठों पर ठहर जाता है,
कभी कोई अधूरा ख़्वाब ख़ामोशी से दिल का दरवाज़ा खटखटाता है।
वक्त ठहरता कहाँ है, वक्त तो चलता जाता है,
धीरे-धीरे ज़िंदगी में सब कुछ बदल जाता है।
किसी को हमसे छीन लेता है, किसी को अपना कर जाता है,
कौन अपना, कौन पराया—वक्त सब दिखा जाता है।
याद आता है वो दौर, जब अपने साथ हुआ करते थे,
उनकी दुआओं के साये में हम महफ़ूज़ रहा करते थे।
छोटी-छोटी खुशियों में भी दिल आबाद रहता था,
अपनों का साथ ही उस दौर की सबसे बड़ी दौलत था।
वक्त धीरे-धीरे हमें सब कुछ सिखा जाता है,
कभी हँसाता है, कभी रुला जाता है।
जो लोग कभी ज़िंदगी का हिस्सा हुआ करते थे,
वक्त उन्हें यादों का हिस्सा बना जाता है।
अब्बू की उँगली पकड़कर जब चला करता था,
छोटी-सी उँगली में पूरी दुनिया का सहारा मिलता था।
न रास्तों की फ़िक्र थी, न मंज़िल की तलाश,
बस अब्बू का साथ था, और दिल में पूरा विश्वास।
वो चाय का खोखा, वो मटरी का स्वाद,
वो बचपन की खुशियाँ, वो अपनों की याद।
आज भी सोचता हूँ, वो जगह कैसी होगी,
वहाँ चाय तो बनती होगी, मगर वो बात कहाँ होगी?
उस चाय में सिर्फ़ चाय का स्वाद नहीं था,
उसमें बचपन था, अपनों का प्यार था।
वो लम्हे थे ज़िंदगी के सबसे हसीन,
जिन्हें दोबारा जीना अब मुमकिन नहीं।
जिस उम्र में माँ की गोद दुनिया हुआ करती थी,
उसी उम्र में मेरी दुनिया अधूरी हो गई थी।
अम्मी का साया जब सिर से उठ गया,
बचपन का एक खूबसूरत हिस्सा कहीं छूट गया।
अब्बू ने फिर भी मुझे सँभालकर रखा,
हर मुश्किल में अपने सीने से लगाकर रखा।
कपड़े सँवारना, स्कूल के लिए तैयार करना,
मेरी छोटी-छोटी ज़रूरतों का ख़याल करना।
उन्होंने सिर्फ़ बाप का फ़र्ज़ नहीं निभाया,
अपनी मोहब्बत से माँ का एहसास भी दिलाया।
एक ही सीने में दोहरी मोहब्बत सँभाल ली,
मेरी ख़ातिर उन्होंने कितनी ज़िम्मेदारियाँ पाल लीं।
वो मोहल्ले के दोस्त, वो खेल और शरारत,
वो छोटी-छोटी बातों पर रूठना और मनाना।
न मोबाइल की ज़रूरत, न खिलौनों का ख़ज़ाना,
बस साथ मिलकर हँसना ही था दुनिया का फ़साना।
काश, फिर अब्बू की उँगली पकड़कर चल पाऊँ,
काश, बचपन की गलियों में एक बार लौट जाऊँ।
काश, उसी खोखे पर बैठकर चाय-मटरी खाऊँ,
काश, दोस्तों के संग फिर बच्चा बन जाऊँ।
मगर वक्त की फ़ितरत है, वो लौटकर नहीं आता,
बचपन बीत जाता है, इंसान बड़ा हो जाता है।
पीछे रह जाती हैं यादें—कुछ मीठी, कुछ नम,
कुछ आँखों में आँसू, कुछ होंठों पर मुस्कान बनकर हरदम।
काश, उम्र की घड़ी को कुछ पल पीछे घुमा पाता,
अब्बू की उँगली पकड़कर फिर से बच्चा बन जाता।
जो लम्हे कभी आम थे, आज सबसे ख़ास लगते हैं,
बचपन के दिन ही शायद ज़िंदगी के सबसे पास लगते हैं।
रोशन किया जो घर को, ख़ुद अँधेरों में जिए,
बच्चों की ख़ुशी के लिए न जाने कितने ग़म पिए।
औलाद के वास्ते अपनी उम्र तमाम कर दी,
अपनी हर ख़ुशी बच्चों के नाम कर दी।
अपनी जवानी, अपने अरमान कुर्बान कर दिए,
बच्चों के सुनहरे कल के लिए दिन-रात एक कर दिए।
एक-एक पाई जोड़कर उन्हें पढ़ाया-लिखाया,
अपने हिस्से की खुशियाँ भी उनके नाम लगाया।
उम्मीद थी कि बच्चे एक दिन सहारा बनेंगे,
बुढ़ापे की धूप में ठंडी छाँव बनेंगे।
मगर जब वही बच्चे एक दिन यह कह जाते हैं,
"आपने हमारे लिए किया ही क्या है?"
तो बरसों की कुर्बानियाँ भी ख़ामोश हो जाती हैं,
माँ-बाप की आँखों में छिपी नमी बहुत कुछ कह जाती है।
जिन्होंने ख़ुद भूखे रहकर बच्चों को खिलाया,
जिन्होंने हर मुश्किल में उन्हें सीने से लगाया,
उनकी मोहब्बत का हिसाब भला कौन लगाएगा?
माँ-बाप का क़र्ज़ कोई औलाद कैसे चुकाएगा?
माँ-बाप की मोहब्बत का कोई मोल नहीं होता,
उनकी दुआओं से बढ़कर कोई अनमोल नहीं होता।
जब तक सिर पर उनका साया बना रहता है,
ज़िंदगी का हर मुश्किल रास्ता आसान लगता है।
ज़िंदगी के रास्तों में मुश्किलें हज़ार आती हैं,
कभी धूप, कभी आँधियाँ, कभी रातें सताती हैं।
मगर जो हौसलों को अपने दिल में ज़िंदा रखते हैं,
वही हर मुश्किल के आगे कदम बढ़ाते हैं।
हर ठोकर हमें चलना सिखाती है,
हर मुश्किल एक नया सबक़ सिखाती है।
जो हारकर भी उठ खड़े होते हैं,
मंज़िलें उन्हीं के क़दम चूमती हैं।
रास्ते मुश्किल हों तो हौसला बनाए रखना,
आँधियाँ चलें तो भी दिया जलाए रखना।
ज़िंदगी हर मोड़ पर इम्तिहान लेगी,
तुम बस अपने भीतर उम्मीद जगाए रखना।
TAGS='poem'
Logged out — showing 389 public records only. Login to see 437 private items.
No memories match this filter.
Jump to detailed list ↓ · 389 clickable cards
Comments (0)
No comments yet. Be the first to share your thoughts!