शहर में आकर गाँव याद आता है… दूरी बढ़ने पर
लोग कहते हैं,
गाँव से शहर जाने वाले लोग,
धीरे-धीरे अपने गाँव को भूल जाते हैं।
लेकिन मेरा अनुभव कुछ और कहता है,
गाँव छोड़ने वालों को ही शायद गाँव ज़्यादा याद आता है।
क्योंकि अब वे वहाँ रहते नहीं,
इसलिए उनकी यादों में गाँव आज भी वैसा ही है,
जैसा उसे छोड़कर आए थे।
वही गलियाँ, वही चौपाल,
वही खेत, वही पेड़,
वही दोस्तों की महफ़िल,
और बचपन के वे अनमोल दिन।
लेकिन जो लोग आज भी गाँव में रहते हैं,
उन्होंने गाँव को बदलते हुए देखा है।
पुरानी गलियों की जगह नई सड़कें बनते देखीं,
पुराने घरों को बदलते देखा,
पुराने चेहरों की जगह नए चेहरे आते देखे।
उनके पास आज की यादें भी हैं,
कल की बातें भी हैं,
इसलिए शायद पुरानी यादें
उनके मन में उतनी गहराई से नहीं ठहरतीं।
जो गाँव छोड़ आया,
उसके लिए गाँव यादों में आज भी पुराना है।
और जो गाँव में रह गया,
उसके लिए गाँव हर दिन नया होता गया।
शायद इसी लिए दूरी बढ़ने पर
यादें कम नहीं होतीं,
बल्कि और गहरी हो जाती हैं।
क्योंकि जो बदलाव हम रोज़ देखते हैं,
उसे धीरे-धीरे स्वीकार कर लेते हैं;
लेकिन जिसे पीछे छोड़ आते हैं,
उसे अपने दिल में हमेशा सँभालकर रखते हैं।
अजीब है न…
गाँव में रहने वाला गाँव के साथ आगे बढ़ता है,
और गाँव से दूर रहने वाला
अपनी यादों में बार-बार पीछे लौटता है।
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